डॉक्टर-(विशेषज्ञ—थैलेसीमिया) – डॉ नितिन सूद

Dr Nitin Sood

डॉ नितिन सूद एमडी, डीएनबी, एमआरसीपी (यूके),
एफआरसीपैथ (नैदानिक हेमेटोलॉजी), सीसीटी (यूके)
एसोसिएट निदेशक
हेमटोलॉजी और स्टेम सेल प्रत्यारोपण
मेदांता-द मेडिसिटी, गुड़गाँव

थैलेसीमिया क्या है?

 
थैलेसीमिया वंशानुगत विकारों का एक समूह है, जिसकी उत्पत्ति भूमध्य क्षेत्र में हुई थी। आमतौर पर, थैलेसीमिया उस आबादी में प्रचलित है जो आर्द्र जलवायु में विकसित हुए थे और जहां मलेरिया स्थानिक बीमारीके रूप में पाया जाता था। थैलेसीमिया सभी नस्लों को प्रभावित करता है, क्योंकि रक्त कोशिकाओं के आसान क्षरण के कारण थैलेसीमिया इन लोगों को मलेरिया से बचाता था। इन स्थितियों में आनुवंशिक दोष के परिणामस्वरूप हीमोग्लोबिन के घटकों में से एक का संश्लेषण कम हो जाता है। ज्यादातर लोगों में यह एक समस्या नहीं बनता है और व्यक्ति इस दोष का वाहक कहा जाता है। समस्या तब पैदा होती है जब दो वाहक शादी करते हैं और उनका बच्चा दोनों दोषी जीनों की वजह से थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित हो जाता है।
थैलेसीमिया मेजर एक ऐसी स्थिति है जो आमतौर पर बचपन में पता चलती है। प्रभावित बच्चों में विकास मंदता होती है और प्रत्येक 3 से 4 सप्ताह में रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है, जिसके परिणामस्वरूप लौह अधिभार होता है। समाज में इस स्थिति की व्यापकता निर्धारित करना कठिन है क्योंकि अधिकांश मामले विकासशील दुनिया में हैं जहां विश्वसनीय जानकारी की कमी है।

इस स्थिति का उपचार अपने जोखिम और असुविधा के साथ नियमित रक्त चढ़ाने के आसपास घूमता है। रक्त की दुर्लभ उपलब्धता के अलावा, संक्रमण, लोहे के अधिभार और एंटीबॉडी के गठन के कारण बार बार रक्त चढ़ाने में कई समस्याएं आती हैं।




थैलेसीमिया के लिए सबसे प्रभावी हस्तक्षेप क्या है?

संभवतः पुरानी कहावत का सबसे अच्छा उदाहरण “रोकथाम इलाज से बेहतर है” थैलेसीमिया मेजर है। इस स्थिति के आनुवांशिक और आणविक आधार को समझते हुए, हमने इस जानकारी को समुदायों पर लागू करने में सफलता पाई है। आनुवंशिक असामान्यताओं के स्थानीय और जातीय-विशिष्ट प्रतिमानों की पहचान करने के लिए अब तक का सबसे प्रभावी हस्तक्षेप जनसंख्या की स्क्रीनिंग रहा है। उपयोगी होने के लिए, एक स्क्रीनिंग प्रोग्राम को एक शिक्षा कार्यक्रम के साथ जोड़ा जाना चाहिए जिसमें स्थानीय समुदाय के नेता, प्रभावित आबादी और स्थानीय डॉक्टर शामिल हों। समुदाय और उसके नेताओं को आवश्यक परीक्षण (आनुवंशिक, यदि आवश्यक हो), आनुवंशिक परामर्श और प्रसव पूर्व परीक्षण के लिए स्थानीय रूप से मौजूद सुविधाओं को सुनिश्चित करना है। इसके बाद सामान्य समुदाय के सदस्यों के समर्थन, सामाजिक समर्थन और समुदाय के नेताओं के समर्थन से प्रभावित जोड़े को उपलब्ध सूचना पर कार्य करने की अनुमति दी जाती है जिस से यदि आवश्यक हो तो प्रभावित गर्भावस्था को समाप्त कर सकें। सामुदायिक स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के सफल उदाहरण हैं ग्रीस, इटली और साइप्रस जहां थैलेसीमिया से पीड़ित बहुत कम बच्चे अब पैदा हो रहे हैं।

थैलेसीमिया के लिए उपचार के विकल्प क्या हैं?

थैलेसीमिया का उपचार रोग के प्रकार के अनुसार भिन्न होता है – मामूली संस्करणों में बहुत कम चिकित्सीय इनपुट से लेकर नियमित रूप से रक्त चढ़ाने और बीटा थैलेसीमिया मेजर में आयरन केलेशन थेरेपी तक।

आधान(नियमित रक्त चढ़ाना) के आगमन के पहले, बीटा थैलेसीमिया मेजर एक घातक बीमारी थी। साठ के दशक में, नियमित आधान चिकित्सा ने इस स्थिति को एक पुरानी बीमारी में बदल दिया, लेकिन प्रभावित बच्चे अपने दूसरे दशक में लोहे के अधिभार की जटिलताओं से मर जाते थे। शरीर में लोहे के उच्च स्तर (नियमित रक्त आधान के परिणामस्वरूप) में कटौती करने के लिए उपचार 1970 के दशक में शुरू हुआ और आयु में सुधार हुआ।

थैलेसीमिया उपचार में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता दर क्या है?

हेमटोपोइएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण 1980 के दशक में शुरू हुआ और पहली बार इस भयानक बीमारी से इलाज की पेशकश की गई, लेकिन इस प्रकार का उपचार केवल रोगियों के एक चयनित सबसेट को पेश किया जा सकता है। दुनिया भर में 3000 से अधिक रोगियों में इस प्रक्रिया का उपयोग किया जा चुका है। स्टेम सेल ट्रांसप्लांट करने का औचित्य यह है कि यह असामान्य कोशिकाओं का निर्माण करने वाली अप्रभावी अस्थि मज्जा को प्रतिस्थापित करता है, जो रक्त आधान की आवश्यकता को कम करती है। थैलेसीमिया में बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक तरह की सेल रिप्लेसमेंट थेरेपी है।

थैलेसीमिया में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता दर प्रत्यारोपण के समय शरीर में लोहे के स्तर पर बहुत अधिक निर्भर करती है। पर्याप्त रक्त उप्लभ्तता, अच्छा चिकित्सा उपचार और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आयरन रिमूवल दवाई (दवाओं का सेवन) का इष्टतम उपयोग एक सफल प्रत्यारोपण की कुंजी है। जिन रोगियों का लोहे का उपचार अच्छा होता है, और यकृत का आकार सामान्य होता है उनमें अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण से 90% सफलता दर की उम्मीद की जा सकती है।

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